गाड़ी के चालान की राशि बिजली के बिल में जुड़ेगी, सुप्रीम कोर्ट का सुझाव
- श्वेता रंजन
गाड़ी के चालान की राशि बिजली के बिल में जुड़ेगी, सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव है। क्या देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट का हर फैसला practical भी होता है? कोर्ट का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन हर न्यायिक सुझाव.. या आदेश, … असलियत में व्यवहारिक , और कानूनी रूप से काम कर सके, यह जरूरी नहीं।”
हमारी अदालतें संविधान और कानून की रक्षा करती हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे न्यायिक निर्देश भी सामने आते हैं जिनके व्यावहारिक रूप से लागू होने पर सवाल खड़े होते हैं।
एक उदाहरण दो दशक पहले का है, साल 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने traffic challan के मामले में कहा था कि चालान की तय रकम के अलावा 500 रुपये अतिरिक्त cost भी ली जाए। यानी कि 100 रुपये का challan है तो 600 रुपए जमा करो, यदि 1,000/- का चालान है तो 1,500/- जमा करो। हाईकोर्ट के इस आदेश में सबसे अहम बात यह थी कि कोर्ट ने हर चालान में 500/- रुपये Cost के रूम में जोड़ने को कहा था जबकि Cost का मतलब यह होता है कि कोर्ट में दायर किसी मुकदमे में जब कोई हारता है तो कोर्ट हारने वाली पार्टी पर कभी कभी cost यह कह कर लगाती है कि दूसरे पक्ष को, जो कि सही है, उसे पैसा खर्च करके मुकदमें की पैरवी करनी पड़ी, तो ऐसें में उस पार्टी को cost की राशि मिलती है, लेकिन गाड़ियों के चालान के मामले में कोर्ट में कोई मुकदमा नही है और न ही गाड़ी मालिक के सामने कोई पक्ष है जिसे गाड़ी मालिक की तरफ से कोई नुकसान हुआ। इसके बाद साल 2008 में Supreme Court ने दिल्ली हाई कोर्ट के इस आदेश को stay कर दिया था।
अब जरा आज की बात देखिए।
Supreme Court में traffic challans की करोड़ों रुपये की pending रकम की recovery के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव सामने आया , कि चालान की बकाया राशि को बिजली के बिल में जोड़ कर वसूलने जैसे विकल्पों पर विचार किया जाए।
लेकिन सवाल यह है—
Traffic Police अलग विभाग है,
Electricity Department अलग।गाड़ी किसके नाम है?
गाड़ी का address क्या है?
और बिजली का connection किस व्यक्ति के नाम है?
अगर गाड़ी किसी और के नाम है और बिजली का meter किसी दूसरे व्यक्ति के नाम, गाड़ी का चालान एक राज्य में कटा और वह गाड़ी किसी दूसरे में रजिस्टर्ड है तो बिजली के बिल के साथ चालान की वसूली कैसे होगी, यही वजह है कि न्याय केवल आदेश देने का नाम नहीं है; न्याय का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है—उस आदेश को जमीन पर लागू कैसे किया जाएगा। क्योंकि, जो फैसला कागज पर आसान दिखाई देता है, … जरूरी नहीं कि जमीन पर भी उतना ही आसान हो।”
इस पर अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं, कयोकिं यह अभी सुप्रीम कोर्ट का सुझाव है, जिसे अंतिम रूप लेनें में आपकी राय बेहद कारगर साबित होगी ।

