अनिल अंबानी को सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की इजाजत के बिना देश छोड़ने की मनाही की
- श्वेता रंजन
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनिल अंबानी मामले में सीबीआई और ईडी की जांच में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि आगे जांच में किसी भी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अनिल अंबानी को कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना देश से बाहर जाने की मनाही की है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अनिल अंबानी के खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर जारी किए जा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अनिल धीरुभाई अंबानी ग्रुप ADAG से संबंधित 40 हजार करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड केस में जांच एजेंसी CBI और ईडी पर नाराजगी जताई है, कोर्ट ने कहा कि CBI और ED मामले की जांच में देरी का कारण नहीं बता सकीं, जोकि पहले ही काफी समय ले चुकी हैं। कोर्ट ने सीबीआई और ईडी को कहा कि आगे ऐसी ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगे। कोर्ट CBI और ED को चार हफ्ते में जांच की ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच कर रही है।
दरअसल याचिकाकर्ता पूर्व आईएएस अधिकारी ईएएस सरमा ने सुप्रीम कोर्ट में अनिल अंबानी के देश छोड़ने की आशंका जताई थी । सुनवाई के दौरान अनिल अंबानी ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना वह देश नहीं छोड़ेंगे।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अनिल समूह की कंपनियों के जरिए करीब 40 हजार करोड़ रुपये सायफन किए जाने का आरोप है। तब कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की कि यह इतनी बड़ी रकम सायफन होने का मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने ED के हलफनामे को रिकॉर्ड में लिया कि अपराध से अर्जित आय ₹20 हजार करोड़ से अधिक आंकी गई है और ईडी 8,078 करोड़ रुपए की संपत्ति अस्थायी रूप से अटैच कर चुकी है।
अनिल अंबानी के वकील श्याम दीवान ने सार्वजनिक धन की हेराफेरी के आरोपों से मना किया। उन्होंने कहा कि रिलायंस पावर और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने करीब 20 हजार करोड़ रुपये चुका दिए हैं, इसलिए कारोबारी घाटे और कर्ज की अदायगी में चूक पर आपराधिक केस नहीं बनाना चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 23 जनवरी को CBI और ED को मामले की जांच की स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दाखिल करने को कहा था और अनिल अंबानी और उनकी कंपनी ADAG को नोटिस जारी किया था।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2007-08 से फ्रॉड चल रहा था, लेकिन FIR वर्ष 2025 में दर्ज हुई। याचिका के मुताबिक साल 2013-17 के बीच RCOM, रिलायंस इंफ्राटेल RITL और रिलायंस टेलिकॉम RTL ने SBI और अन्य बैंक से 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज लिया था। लेकिन बाद में लोन की रकम को तय मकसद के बजाय दूसरी जगह इस्तेमाल हुआ, इसके अलावा कुछ मामलों में ग्रुप की दूसरी कंपनियों को फंड ट्रांसफर किया गया और समय पर लोन चुकाने में भी चूक NPA हुई।
वहीं ED ने जांच में पाया है कि रिलायंस होम फाइनेंस RHFL और रिलायंस कॉमर्शियल फाइनेंस RCFL में बड़े पैमाने पर फंड्स का गलत इस्तेमाल हुआ। साल 2017 से 2019 के बीच यस बैंक ने RHFL में 2,965 करोड़ रुपये और RCFL में 2,045 करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट किया था। दिसंबर 2019 तक ये रकम नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स NPA बन गए। RHFL का 1,353 करोड़ रुपये और RCFL का 1,984 करोड़ रुपये अभी तक बकाया है, इस तरह कुल मिलाकर यस बैंक को 2,700 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ। ED ने जांच में पाया कि ये फंड्स रिलायंस ग्रुप की दूसरी कंपनियों में डायवर्ट किए गए।

